इस बार चिराग जिसके लिए जलेगा BJP या NDA के लिए

 बिहार की सियासत में आए दिन नए नए रूप देखने को मिल रहा है. सियासी उठापटक तो आम बात है लेकिन आपने वो कहावत तो जरूर सुना होगा "दोस्त परीक्षा फेल हो जाए तो उतना दुःख नहीं होता है जितना की उसके पास होने में होता है." इस वाक्ये के साथ साल 2020 का विधानसभा चुनाव याद करिए किस तरह से बिहार की सियासत में दो गठबंधन की पार्टी ने एक तीसरी पार्टी को अपने सह में लेकर अपने ही साथी पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी. हालांकि चुनाव के बाद जदयू ने अपने हार का आंकलन किया तो उसने साफ साफ कहा था कि 25 ऐसी सीटें थी जिसमें चिराग पासवान की पार्टी ने जदयू को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. चिराग के एक भी विधायक जीतने में कामयाव नहीं हुए लेकिन उन्होंने वोटों के लिहाज से नीतीश कुमार की पार्टी को नुकसान पहुंचाया लेकिन उसके बाद भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे. चुनाव के बाद एक एक कर चिराग के नेता जो चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर चिराग के साथ गए थे वे सभी नेता अपनी पार्टी में फिर से वापस आ गए. 


इस पूरी घटना को जदयू दूर से खड़ा होकर देख रही थी. अब एक बार फिर से स्थिति वहीं आ गई है जहां पिछली बार से शुरू हुआ था. 2025 का विधानसभा चुनाव कुछ महीनों के बाद होना है. चिराग पासवान को लोग मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने लगे हैं. उनके साथ के नेता चिराग को अपना हीरों मान रहे हैं. इतना ही नहीं चिराग पासवान हाजीपुर से सांसद होने के बाद भी बिहार में विधानसभा का चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं. हाजीपुर लोकसभा से ही किसी सीट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं. ऐसे में अब कहा जा रहा है कि चिराग क्या करेंगे गठबंधन धर्म का पालन करेंगे या फिर मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी पेश करेंगे. क्योंकि एनडीए में नीतीश कुमार खुद मुख्यमंत्री का चेहरा हैं और बीजेपी के पास सबसे ज्यादा विधायक हैं तो फिर चिराग किस लिहाज से अपने आप को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं यह तो सोचने वाली बात होगी. हालांकि साल 2005 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के पिता स्वः रामविलास पासवान के पास बिहार के सत्ता की चाभी थी और उन्हें लग रहा था कि बिहार में उनके बिना सरकार नहीं बन सकती है हालांकि बाद में चुनाव हुआ और नीतीश कुमार बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी उसके बाद से रामविलास पासवान की पार्टी अपने लिए जमीन तलास रही है. 


बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी एक बार फिर से चिराग पासवान दवाब बना कर सीटों की संख्या में इजाफा करना चाहते हैं. लेकिन इस बार खेल बदल गया है. पिछली बार नीतीश कुमार और बीजेपी में सहयोगियों को लेकर बंटबारा हो गया था उन्हें अपने अपने हिस्सें के सीटों में बंटबारा करना था लेकिन इस बार नीतीश कुमार की पार्टी के पास कोई भी सहयोगी नहीं है. मतलब साफ है कि नीतीश कुमार इस चुनाव अकेले हैं. ऐसे में कोई भी उन्हें सीटों को लेकर दवाब नहीं बना सकता है. ऐसे में नीतीश कुमार के पास एक मौका यह भी है कि वे आधे-आधे सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह सकते हैं. हालांकि ऐसा होता प्रतित हो नहीं रहा है. क्योंकि इस बार अगर हम स्थितियों को देखें तो हम पाएंगे कि चिराग पासवान का झुकाव पहले से बीजेपी की तरफ है. जीतन राम मांझी की पार्टी को बीजेपी ने केंद्र में मंत्री पद दिया है. उपेंद्र कुशवाहा बीजेपी की सीट से राज्यसभा के सांसद हैं. ऐसे में यह साफ पता चल रहा है कि नीतीश कुमार इस बार किसी की नहीं सुनने वाले हैं. खासकर चिराग पासवान की तो एक दम नहीं. पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से ही चिराग पासवान को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी नाक मुंह सुकोड़ते रही है. 


अब देखना है कि सीटों के बंटबारे के साथ ही यह भी तय हो जाएगा कि बिहार की सियासत में किस पार्टी को कितना भाव दिया जा रहा है. क्योंकि बीच-बीच में जीतन राम मांझी के भी सुर बदल गए थे. इधर उपेंद्र कुशवाहा ने भी अलग राग अलापा है और चिराग तो खुद को मुख्यमंत्री मान ही रहे हैं ऐसे में सीटों को लेकर होने वाला फैसला काफी अहम होगा.

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